

उत्तराखंड को लंबे समय तक स्वच्छ और शुद्ध पानी के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन एक नई रिपोर्ट ने इस धारणा को झकझोर कर रख दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक अब पहाड़ी क्षेत्रों के छोटे कस्बों का भूजल भी शुद्ध नहीं रहा और उसकी स्थिति धीरे-धीरे मेट्रो शहरों जैसी प्रदूषित होती जा रही है। यह खुलासा उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ताजा जांच में हुआ है, जिसने प्रदेश के सभी जिलों में पानी की गुणवत्ता का विस्तृत अध्ययन किया।

जांच के दौरान पानी को भौतिक, रासायनिक, जैविक और भारी धातुओं सहित 32 मानकों पर परखा गया। रिपोर्ट में सामने आया कि चमोली जिले को छोड़कर राज्य के लगभग सभी पहाड़ी जिलों में भूजल में आयरन की मात्रा तय मानकों से अधिक पाई गई। खास तौर पर देहरादून, हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर जैसे इलाकों में यह समस्या गंभीर रूप लेती दिख रही है। यह स्थिति इस बात का संकेत है कि पहाड़ों का पानी अब पहले की तरह स्वाभाविक रूप से स्वच्छ नहीं रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ता ठोस कचरा, अनियंत्रित शहरीकरण और गंदे पानी का जमीन में रिसाव भूजल प्रदूषण की बड़ी वजह बन रहा है। धीरे-धीरे यह प्रदूषण जमीन के भीतर समाकर पानी की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचा रहा है। इस तरह का दूषित पानी पीने से किडनी, लिवर, त्वचा और पेट से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। साथ ही पानी में आयरन की अधिक मात्रा शरीर में कैल्शियम और जिंक के अवशोषण को भी प्रभावित करती है, जिससे लंबे समय में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

रिपोर्ट यह साफ संकेत देती है कि जल संकट अब केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पहाड़ों के छोटे कस्बे भी इसकी चपेट में आ चुके हैं। यदि समय रहते ठोस कचरा प्रबंधन, जल संरक्षण और भूजल की नियमित निगरानी पर गंभीर कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड के लिए स्वच्छ पेयजल एक बड़ी चुनौती बन सकता है।







