


उत्तराखंड के हरिद्वार में आगामी कुंभ 2027 को लेकर हर की पैड़ी और गंगा घाटों पर गैर‑हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने की मांग ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को फिर से गरमा दिया है। इस मुद्दे को लेकर कुछ धार्मिक संगठनों और स्थानीय नेताओं ने इसे आवश्यक बताया है ताकि गंगा घाटों की पवित्रता और सनातन परंपराओं की रक्षा की जा सके। उनका तर्क है कि श्रद्धालुओं की आस्था और धार्मिक मर्यादा बनाए रखने के लिए यह कदम अनिवार्य है।
लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) के वरिष्ठ नेता एस.टी. हसन ने इस मांग पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत एक ऐसा देश है, जहां हर नागरिक को कहीं भी यात्रा करने और अपने अधिकारों का उपयोग करने का संवैधानिक अधिकार है। उनका कहना है कि “यह देश किसी एक समुदाय का नहीं है, यह सबका है। किसी भी नागरिक के आधार पर प्रवेश को रोकना संविधान के खिलाफ होगा। यदि कोई व्यक्ति कानून का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन पूरी श्रेणी को प्रतिबंधित करना गलत है।” हसन ने यह भी कहा कि इस तरह की चर्चाओं से समाज में नफरत और विभाजन फैलने का खतरा रहता है, और इसे रोकना आवश्यक है।
इससे पहले श्री गंगा सभा और अन्य धार्मिक संगठनों ने कहा था कि हर की पैड़ी और कुंभ क्षेत्र की धार्मिक मर्यादा और गंगा घाटों की पवित्रता बनाए रखने के लिए गैर‑हिंदुओं का प्रवेश प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि यह न केवल श्रद्धालुओं के लिए जरूरी है बल्कि सरकारी अधिकारियों, मीडिया कर्मियों और अन्य आगंतुकों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि इससे धार्मिक अस्मिता की रक्षा होगी और कुंभ जैसे बड़े धार्मिक आयोजन की गरिमा बनी रहेगी।
उत्तराखंड सरकार भी इस विषय पर गंभीर है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पहले ही कहा था कि इस मसले पर सभी पहलुओं का ध्यान रखते हुए विचार किया जा रहा है, ताकि धार्मिक परंपराओं और आस्था की सुरक्षा के साथ ही संविधानिक अधिकारों का भी सम्मान हो। मामले में संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि यह धार्मिक भावनाओं और नागरिक अधिकारों के बीच संवेदनशील संतुलन का मुद्दा बन गया है।
इस पूरे विवाद से यह स्पष्ट होता है कि हरिद्वार जैसे पवित्र तीर्थस्थल में धार्मिक मर्यादा और सभी नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना सरकार और समाज के लिए अहम चुनौती है।

