

यूजीसी द्वारा वर्ष 2026 के लिए जारी किए गए नए नियम इन दिनों देशभर में चर्चा और विवाद का विषय बने हुए हैं। 15 जनवरी से देश के सभी विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू किए गए इन नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा परिसरों में समानता और भेदभाव-मुक्त वातावरण सुनिश्चित करना बताया गया है। हालांकि, इन्हीं नियमों के एक प्रावधान सेक्शन 3 (C) को लेकर सामान्य वर्ग यानी सवर्ण समुदाय में गहरी नाराजगी देखने को मिल रही है।

नए यूजीसी नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में समान अवसर केंद्र, समता हेल्पलाइन और भेदभाव से जुड़े मामलों की जांच के लिए विशेष समितियों का गठन अनिवार्य किया गया है। इसके साथ ही ऐसे मामलों के त्वरित निस्तारण और गंभीर स्थिति में पुलिस को सूचित करने की व्यवस्था भी रखी गई है। यूजीसी का कहना है कि इन कदमों से शिक्षा संस्थानों में सामाजिक न्याय और समावेशी माहौल को बढ़ावा मिलेगा।

विवाद की जड़ यूजीसी नियमों का सेक्शन 3 (C) है, जिसमें जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा दी गई है। इस प्रावधान के अनुसार, जाति के आधार पर भेदभाव केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के खिलाफ किए गए व्यवहार के संदर्भ में ही माना जाएगा। इसी बात को लेकर सामान्य वर्ग के छात्र और संगठन आपत्ति जता रहे हैं। उनका कहना है कि इस परिभाषा में सामान्य वर्ग के छात्रों को पूरी तरह बाहर कर दिया गया है, जिससे उन्हें भेदभाव की स्थिति में कोई कानूनी या संस्थागत सुरक्षा नहीं मिल पाएगी।
सवर्ण संगठनों और छात्रों का तर्क है कि भेदभाव किसी भी वर्ग के साथ हो सकता है और नियम सभी के लिए समान होने चाहिए। उनका यह भी कहना है कि नए प्रावधानों में झूठी शिकायतों को रोकने या उनके खिलाफ दंड का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जिससे नियमों के दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाती है। कुछ लोगों ने यह सवाल भी उठाया है कि यदि किसी मामले को संज्ञेय अपराध मानते हुए पुलिस तक भेजा जाता है, तो इससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और शैक्षणिक माहौल पर क्या असर पड़ेगा।
यूजीसी के इन नियमों को लेकर देशभर के शैक्षणिक परिसरों में बहस तेज हो गई है। एक तरफ जहां समर्थकों का मानना है कि यह कदम हाशिए पर रहे वर्गों को सुरक्षा और समान अवसर देने के लिए जरूरी है, वहीं दूसरी ओर विरोध करने वालों का कहना है कि नियमों का दायरा सभी वर्गों के लिए समान होना चाहिए। फिलहाल, सेक्शन 3 (C) को लेकर उठे सवालों ने यूजीसी के 2026 नियमों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है और आने वाले समय में इस पर और स्पष्टता या संशोधन की मांग तेज हो सकती है।







