

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के लागू होने की पहली वर्षगांठ 27 जनवरी को पूरी होने जा रही है। इस महत्वपूर्ण अवसर से ठीक पहले राज्य सरकार द्वारा लाए गए यूसीसी संशोधन अध्यादेश को राज्यपाल की स्वीकृति मिल चुकी है। इसके साथ ही यह संशोधन अध्यादेश पूरे प्रदेश में प्रभावी रूप से लागू हो गया है। सरकार का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य समान नागरिक संहिता को और अधिक व्यावहारिक, पारदर्शी तथा सुचारू बनाना है, ताकि इसके क्रियान्वयन में किसी प्रकार की प्रशासनिक या कानूनी बाधा न आए।

इस संशोधन अध्यादेश के जरिए संहिता के कई प्रावधानों में प्रक्रियात्मक, प्रशासनिक और दंडात्मक स्तर पर अहम सुधार किए गए हैं। अब आपराधिक प्रक्रिया से जुड़े मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के स्थान पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 को लागू किया गया है, जबकि दंड से संबंधित मामलों में भारतीय न्याय संहिता, 2023 के प्रावधान प्रभावी होंगे। इससे कानून व्यवस्था को वर्तमान समय की जरूरतों के अनुरूप अधिक आधुनिक और स्पष्ट रूप मिला है।
संशोधन के तहत प्रशासनिक व्यवस्था को भी सशक्त किया गया है। धारा 12 में पहले जहां ‘सचिव’ को सक्षम प्राधिकारी माना गया था, अब उसकी जगह ‘अपर सचिव’ को नामित किया गया है। वहीं यदि उप-पंजीयक तय समय-सीमा के भीतर किसी मामले में कार्रवाई नहीं करता है, तो वह प्रकरण स्वतः पंजीयक और पंजीयक जनरल को अग्रेषित हो जाएगा, जिससे मामलों के अनावश्यक लंबित रहने की संभावना कम होगी।
दंडात्मक प्रावधानों में भी स्पष्टता लाई गई है। उप-पंजीयक पर लगाए गए दंड के खिलाफ अब अपील का अधिकार दिया गया है और दंड की वसूली भू-राजस्व की तरह किए जाने का प्रावधान जोड़ा गया है। इसके अलावा विवाह के समय पहचान से संबंधित गलत जानकारी प्रस्तुत किए जाने को विवाह निरस्तीकरण का आधार माना गया है, जिससे धोखाधड़ी पर रोक लगाई जा सके।
विवाह और लिव-इन संबंधों को लेकर भी कानून को अधिक सख्त और स्पष्ट बनाया गया है। बल, दबाव, धोखाधड़ी या किसी भी विधि-विरुद्ध कृत्य के माध्यम से बनाए गए विवाह या लिव-इन संबंधों के लिए कठोर दंडात्मक प्रावधान सुनिश्चित किए गए हैं। वहीं लिव-इन संबंध की समाप्ति पर अब पंजीयक द्वारा समाप्ति प्रमाण पत्र जारी करने का प्रावधान किया गया है, जिससे दोनों पक्षों के अधिकार और स्थिति स्पष्ट हो सकें।
भाषाई और सामाजिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए अनूसूची-2 में ‘विधवा’ शब्द के स्थान पर ‘जीवनसाथी’ शब्द का प्रयोग किया गया है। साथ ही विवाह, तलाक, लिव-इन संबंध और उत्तराधिकार से जुड़े पंजीकरण को निरस्त करने की शक्ति अब पंजीयक जनरल को प्रदान की गई है, जिससे निर्णय प्रक्रिया अधिक केंद्रीकृत और प्रभावी हो सके।
कुल मिलाकर, यूसीसी में किया गया यह संशोधन अध्यादेश कानून को अधिक मजबूत, समयानुकूल और नागरिकों के हितों के अनुरूप बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।







