

गंगा तट पर आयोजित बसंतोत्सव इस बार केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संगीत, साधना और आध्यात्मिक चेतना का भव्य उत्सव बनकर उभरा। ऋषिकेश स्थित प्राचीन भरत मंदिर परिसर में हुए इस आयोजन में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शिरकत की और इसे भारतीय संस्कृति व सनातन परंपरा का जीवंत उदाहरण बताया। कार्यक्रम में साधु-संतों, स्थानीय नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और देश-प्रदेश से आए श्रद्धालुओं की बड़ी उपस्थिति ने आयोजन को और भी गरिमामय बना दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत में भरत मंदिर के महंत वत्सल प्रपन्नाचार्य महाराज ने मंदिर परिवार और आयोजन समिति की ओर से मुख्यमंत्री का आत्मीय स्वागत किया। मुख्यमंत्री ने गंगा के पावन तट पर आयोजित इस बसंतोत्सव को संस्कृति और भक्ति का अनुपम संगम बताते हुए कहा कि ऐसे आयोजन न केवल आध्यात्मिक चेतना को जागृत करते हैं, बल्कि हमारी प्राचीन परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य भी करते हैं। उन्होंने कहा कि ऋषिकेश केवल योग और अध्यात्म की वैश्विक राजधानी नहीं है, बल्कि यह सनातन संस्कृति की वह पवित्र भूमि है, जहां से आध्यात्मिक चेतना ने सदियों तक मानवता को दिशा दी है।
मुख्यमंत्री धामी ने अपने संबोधन में कहा कि यह वही भूमि है, जहां महर्षि रैभ्य जैसे ऋषियों ने तप किया, भगवान श्रीराम ने साधना की और आदि गुरु शंकराचार्य ने आध्यात्मिक ज्ञान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उन्होंने युवा लोक गायिका मैथिली ठाकुर की प्रस्तुति की भी सराहना की और कहा कि उनकी गायकी में लोक-संस्कृति, भक्ति और परंपरा का अद्भुत समावेश देखने को मिलता है, जो हमारी सांस्कृतिक धरोहर को जन-जन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रहा है।
मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश की सांस्कृतिक विरासत को मिल रही नई पहचान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण, बद्रीनाथ-केदारनाथ धामों का पुनर्विकास, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और महाकाल लोक जैसे प्रकल्प भारत की सनातन संस्कृति को विश्व पटल पर स्थापित कर रहे हैं। इसी दृष्टि से प्रेरित होकर उत्तराखंड सरकार भी राज्य में धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों के विकास के लिए निरंतर कार्य कर रही है। केदारखंड-मानसखंड मंदिर माला मिशन, हरिद्वार-ऋषिकेश कॉरिडोर और यमुना तीर्थ पुनरुद्धार जैसी योजनाएं इसी सोच का परिणाम हैं।
मुख्यमंत्री धामी ने यह भी कहा कि राज्य में सेंटर फॉर हिंदू स्टडीज जैसे शैक्षणिक प्रयासों और गढ़वाल-कुमाऊं क्षेत्रों में आध्यात्मिक आर्थिक क्षेत्रों के विकास की योजनाओं के माध्यम से संस्कृति, दर्शन और आध्यात्म को नई पीढ़ी से जोड़ने का कार्य किया जा रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि ऐसे आयोजन और योजनाएं देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को और अधिक सशक्त करेंगी तथा समाज में आध्यात्मिक मूल्यों और संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।







