

देहरादून में नकली और मिलावटी दवाओं का बड़ा मामला सामने आया है। यह फर्जीवाड़ा अफसरों की नाक के नीचे कई सालों से चल रहा था, लेकिन किसी को इसकी खबर नहीं लगी। सहस्त्रधारा रोड पर एक फैक्ट्री और क्लीनिक में नकली आयुर्वेद और होम्योपैथी की दवाएं बनाई और बेची जा रही थीं। हैरानी की बात यह है कि इसी सड़क पर आयुष निदेशालय भी स्थित है।
जब केंद्रीय आयुष मंत्रालय को इसकी जानकारी मिली, तब जाकर कार्रवाई की गई। जांच टीम ने छापा मारकर बड़ी मात्रा में नकली दवाएं बरामद कीं। मौके पर फैक्ट्री का कोई सरकारी पंजीकरण नहीं मिला। जिस “त्रिफला हर्बल सेंटर” के नाम पर यह काम चल रहा था, उसका भी कोई रजिस्ट्रेशन नहीं था और ब्रांड पूरी तरह फर्जी निकला।
जांच में यह भी सामने आया कि यहां सिर्फ आयुर्वेद ही नहीं, बल्कि होम्योपैथी की नकली और अवैध दवाएं भी बनाई जा रही थीं। अब इन दवाओं के सैंपल जांच के लिए भेजे गए हैं, ताकि पता चल सके कि इनमें कौन-कौन सी मिलावट की गई है। दूसरी राज्यों को भी इन दवाओं की जानकारी दी जाएगी, ताकि उनकी बिक्री रोकी जा सके।
छापे के दौरान जांच टीम को एक करोड़ रुपये से ज्यादा नकद पैसा और नोट गिनने की मशीन भी मिली। इसके बाद आयुष विभाग ने इनकम टैक्स विभाग को सूचना दी। अब इनकम टैक्स की टीम मामले की जांच कर रही है। यह फैक्ट्री पिछले पांच सालों से चल रही थी, लेकिन न राज्य सरकार और न ही केंद्र सरकार को इसकी भनक लगी। जब इन नकली दवाओं का कारोबार पूरे देश में फैल गया, तब जाकर जांच एजेंसियों ने कार्रवाई शुरू की।
इस मामले ने जीएसटी विभाग पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। बिना पंजीकरण के बनी ये दवाएं देहरादून से पूरे देश में सप्लाई होती रहीं। आशारोड़ी और नारसन जैसे चेक पोस्ट से होकर ट्रक गुजरते रहे, लेकिन किसी ने इन्हें नहीं रोका। जांच में पता चला है कि देहरादून से बनी नकली दवाएं देश के कई राज्यों में बेची जा रही थीं। पैकिंग के समय दवाओं में मिलावट की जाती थी। मौके से बड़ी संख्या में नकली दवाएं जब्त की गई हैं। यह मामला पूरे सरकारी सिस्टम की लापरवाही को उजागर करता है और लोगों की सेहत के साथ हुए बड़े खिलवाड़ को दिखाता है।







