


मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सत्ता संभालने के बाद केवल पहाड़ों से मैदानों तक भौगोलिक यात्राएँ ही नहीं कीं, बल्कि प्रदेश की जनता की नब्ज को भी बेहद करीब से महसूस किया है। विकास कार्यों की जमीनी हकीकत, लोगों की अपेक्षाएँ और उनकी रोजमर्रा की समस्याएँ—इन सबको समझने के बाद अब सरकार ने अगला कदम उठाया है। मुख्यमंत्री की पहल के बाद पूरी सरकारी मशीनरी गांव-गांव तक पहुंचने के लिए सक्रिय हो चुकी है। ‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ अभियान के तहत आगामी 45 दिनों तक गांवों और न्याय पंचायत स्तर पर बहुद्देश्यीय शिविर लगाए जाएंगे, जिनका उद्देश्य ग्रामीण जनमानस से सीधा संवाद स्थापित कर उनका विश्वास और संतोष अर्जित करना है। नए बजट से पहले धामी सरकार का यह कदम केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी एक सोचा-समझा मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है।
इन बहुद्देश्यीय शिविरों के माध्यम से 23 विभाग एक साथ मैदान में उतरेंगे और वर्षों से समस्याओं से जूझ रहे आम लोगों को मौके पर ही राहत पहुंचाने का प्रयास करेंगे। सरकार का फोकस केवल योजनाओं की जानकारी देने तक सीमित नहीं है, बल्कि पात्र लाभार्थियों को योजनाओं का वास्तविक लाभ दिलाना और उनकी शिकायतों का त्वरित समाधान सुनिश्चित करना भी इसकी प्राथमिकता है। संकेत साफ हैं कि आने वाला बजट भी इन्हीं जनभावनाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप गढ़ा जाएगा, ताकि नीतियाँ केवल कागज़ों तक सीमित न रहें, बल्कि धरातल पर प्रभावी रूप से उतरती दिखाई दें।
उत्तराखंड में अगले विधानसभा चुनाव को अब महज सवा साल का समय शेष है। ऐसे में सत्ता के गलियारों में चुनावी तैयारियों की हलचल साफ महसूस की जा सकती है। वर्षाकाल समाप्त होते ही मुख्यमंत्री धामी ने विकास कार्यों के साथ-साथ चुनावी एजेंडे को धार देने को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में शामिल कर लिया है। प्रदेशभर में लगातार सक्रियता के दौरान मिले फीडबैक और जनसंवाद से निकले निष्कर्षों के आधार पर अब सरकार ने सीधे गांवों की ओर रुख किया है। यह पहली बार है जब गांवों में बहुद्देश्यीय शिविरों का आयोजन इतने व्यापक और संगठित अभियान के रूप में किया जा रहा है।
बुधवार से शुरू हुआ यह अभियान अगले 45 दिनों तक लगातार चलेगा। सभी 23 विभागों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि जनता से जुड़ी समस्याओं के समाधान में किसी भी प्रकार की लापरवाही या देरी न हो। यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि हर न्याय पंचायत स्तर पर कोई भी पात्र व्यक्ति सरकारी कल्याण योजनाओं के लाभ से वंचित न रह जाए। मुख्यमंत्री की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अभियान के पहले ही दिन उन्होंने इसकी समीक्षा की और जिलावार शिविरों की प्रगति की जानकारी स्वयं प्राप्त की।
सरकार इस पूरे अभियान के जरिए जनप्रतिनिधियों, संगठन और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय का संदेश भी दे रही है। साफ संकेत है कि सरकार की कसौटी जनता का संतोष है। दरअसल, उत्तराखंड की राजनीति में ग्रामीण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में विधानसभा सीटों की संख्या भी अपेक्षाकृत अधिक है। यदि गांवों का विश्वास और समर्थन साध लिया गया, तो धामी सरकार के लिए ‘मिशन 2027’ की राह काफी हद तक सुगम हो सकती है। यह अभियान केवल एक शुरुआत भर है। संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले बजट की पोटली में भी ग्रामीणों की आकांक्षाओं को धरातल पर उतारने के लिए ठोस और दूरगामी पहल देखने को मिलेगी।

