

ऋषिकेश: अंगदान की प्रक्रिया में धर्म, जाति या संप्रदाय कभी भी बाधा नहीं बनना चाहिए, क्योंकि ब्रेन डेड व्यक्ति के अंग किसी भी जरूरतमंद इंसान के लिए जीवनदान बन सकते हैं। यही संदेश ऋषिकेश में आयोजित एक जागरूकता कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने दिया। उन्होंने कहा कि अंगदान मानवता का सबसे बड़ा उदाहरण है और इसे किसी भी धार्मिक या सामाजिक दायरे में सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
एम्स ऋषिकेश के सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में दिल्ली एम्स के वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ. दीपक गुप्ता ने ब्रेन डेथ की अवधारणा को सरल शब्दों में समझाया। उन्होंने बताया कि कोमा और ब्रेन डेथ में बुनियादी अंतर है। कोमा की स्थिति में व्यक्ति के ठीक होने की संभावना बनी रहती है, जबकि ब्रेन डेथ ऐसी अवस्था होती है, जिसमें मस्तिष्क पूरी तरह काम करना बंद कर देता है और वहां से वापसी संभव नहीं होती। ऐसी स्थिति में यदि परिजन अंगदान के लिए सहमति देते हैं, तो यह न केवल एक महान मानवीय कार्य होता है, बल्कि कई गंभीर रूप से बीमार लोगों को नया जीवन भी मिल सकता है।
डॉ. गुप्ता ने देश में बढ़ती दुर्घटनाओं और असमय मौतों का जिक्र करते हुए बताया कि हर साल सड़क हादसों में लगभग डेढ़ लाख लोगों की जान जाती है, जबकि धूम्रपान जैसी आदतों के कारण 50 हजार से अधिक लोगों की मृत्यु होती है। यदि इन मामलों में समय रहते ब्रेन डेथ की पहचान कर परिजनों को अंगदान के लिए जागरूक किया जाए, तो हर वर्ष हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि जागरूकता की कमी के कारण पिछले वर्ष लाखों मौतों में से केवल सीमित मामलों में ही अंगदान संभव हो पाया, जो समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए एम्स ऋषिकेश की कार्यकारी निदेशक प्रो. मीनू सिंह ने मेडिकल छात्रों और स्वास्थ्य कर्मियों से आह्वान किया कि वे अंगदान को लेकर समाज में सकारात्मक सोच विकसित करें। उन्होंने कहा कि डॉक्टर और मेडिकल छात्र इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि समाज उनकी बातों पर विश्वास करता है। उन्होंने एम्स ऋषिकेश में स्थापित कॉर्निया बैंक का उल्लेख करते हुए बताया कि नेत्रदान से प्राप्त कॉर्निया के प्रत्यारोपण से कई लोगों की दृष्टि वापस लौट चुकी है, जो अंगदान की महत्ता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि अंगदान केवल चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवेदना और करुणा से जुड़ा हुआ विषय है। जरूरत इस बात की है कि आम लोग डर, भ्रांतियों और धार्मिक गलतफहमियों से ऊपर उठकर इस विषय को समझें और आगे आएं। कार्यक्रम में डीन एकेडमिक प्रो. सौरभ वार्ष्णेय, ऋषिकेश के मेयर शंभू पासवान, विभिन्न विभागों के फैकल्टी सदस्य, मेडिकल छात्र और बड़ी संख्या में सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोग मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में अंगदान को मानवता की सबसे बड़ी सेवा बताते हुए इसके प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया।







