



देहरादून जिले के चकराता क्षेत्र में ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से शादियों और अन्य सामाजिक आयोजनों को लेकर एक अहम और सख्त फैसला लिया है। इस निर्णय के तहत अब विवाह समारोहों और सामूहिक आयोजनों में कई तरह के प्रतिबंध लागू किए जाएंगे। ग्रामीणों का कहना है कि इन नियमों का मुख्य उद्देश्य शादियों को सादगीपूर्ण बनाना, पारंपरिक रीति-रिवाजों को बढ़ावा देना और फिजूलखर्ची तथा दिखावे की प्रवृत्ति पर रोक लगाना है।
नई शादी नियमावली के अनुसार 14 जनवरी से शुरू हो रहे विवाह सीजन के दौरान अब वेडिंग पॉइंट पर शादी या भोज का आयोजन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। खत सिलगांव जैसे स्थानों में किसी भी तरह से वेडिंग पॉइंट के रूप में समारोह आयोजित नहीं किए जा सकेंगे। यदि कोई परिवार इस नियम का उल्लंघन करता है तो उस पर आर्थिक दंड लगाया जाएगा और ग्रामीणों द्वारा ऐसे समारोह में शामिल न होने का भी फैसला लिया गया है।

ग्रामीणों की बैठक में यह भी तय किया गया कि शादियों और सामूहिक त्योहारों के अवसर पर महिलाएं सीमित संख्या में ही गहने पहनेंगी। तय नियमों के अनुसार महिलाएं केवल कान के झुमके या मुंगल, नाक की फुली, मंगलसूत्र, पायल और अंगूठी ही पहन सकेंगी। इससे अधिक आभूषण पहनने की अनुमति नहीं होगी, ताकि सामाजिक बराबरी बनी रहे और दिखावे की होड़ पर अंकुश लगाया जा सके।
बैठक में दुल्हन पक्ष की ओर से दी जाने वाली भेंट को भी सीमित करने का निर्णय लिया गया। तय किया गया कि विवाह के अवसर पर केवल पांच पारंपरिक वस्तुएं, बटवा, परात, कटोरा या थाली, संदूक और बिस्तर ही भेंट में दी जाएंगी। इसके साथ ही शादियों में डीजे पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा और केवल पारंपरिक पहाड़ी बैंड-बाजा बजाने की अनुमति होगी। रईणी भोज के दौरान महिलाओं को नकद राशि देने की परंपरा भी समाप्त कर दी गई है और उसकी जगह केवल आधा किलो मिठाई बांटी जाएगी।
ग्रामीणों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई गांव या परिवार इन तय नियमों का उल्लंघन करता है तो संबंधित गांव पर 50 हजार रुपये तक का अर्थदंड लगाया जाएगा। इस कठोर प्रावधान के जरिए यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है कि विवाह समारोहों में अनावश्यक खर्च, दिखावा और गैर-पारंपरिक गतिविधियों को रोका जा सके।
जौनसार-बावर क्षेत्र के इन गांवों में लिए गए इन फैसलों को सामाजिक समानता, सांस्कृतिक संरक्षण और आर्थिक संतुलन की दिशा में एक बड़ा कदम बताया जा रहा है। जहां एक ओर कई लोग इन नियमों की सराहना कर रहे हैं और इसे समाज के लिए सकारात्मक बदलाव मान रहे हैं, वहीं कुछ लोगों का मानना है कि ये नियम बहुत सख्त हैं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करते हैं। इसके बावजूद ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र की परंपराओं और सामाजिक मूल्यों को बचाने के लिए ऐसे फैसले जरूरी हैं।

