


उच्च न्यायालय दिल्ली: ऋषिकेश क्षेत्र में वन भूमि पर हुए अतिक्रमण को लेकर उच्च न्यायालय में हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट का रुख बेहद कड़ा रहा। मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने न केवल सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए बल्कि अधिकारियों की कार्यशैली को लापरवाही के बजाय मिलीभगत करार दिया। सुनवाई शुरू होते ही मुख्य न्यायाधीश ने सरकारी मशीनरी की कार्यक्षमता पर हैरानी जताई।
कोर्ट ने तल्ख लहजे में कहा कि यह राज्य सरकार की विफलता है। जज साहब ने टिप्पणी करी कि हम हैरान हैं! कि राज्य की मशीनरी पूरी तरह फेल हो चुकी है। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि अधिकारियों की सोची-समझी मिलीभगत प्रतीत होती है। कोर्ट ने सबसे बड़ा सवाल अतिक्रमण की अवधि को लेकर उठाया। सरकारी वकील को फटकार लगाते हुए कोर्ट ने पूछा कि जब साल 2000 से वहां निर्माण हो रहे थे, तब विभाग क्या कर रहा था। 23 सालों तक प्रशासन सोता रहा। आपने लोगों को वहां बसने दिया, उनकी पीढ़ियां वहां बड़ी हो गईं। अब अचानक कोर्ट के आदेशों की आड़ लेकर उन्हें बेघर कर रहे हो। जब सरकारी वकील ने हिंसा का हवाला देते हुए आगे की कार्रवाई की अनुमति मांगी, तो कोर्ट ने उन्हें रोकते हुए कहा कि प्रशासन अपनी मनमानी नहीं कर सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह अब सरकार के पिछले रिकॉर्ड और आचरण को देखेगा। कोर्ट ने सरकार को कहा कि पहले विभाग को अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी। क्षेत्र के निवासियों के लिए फिलहाल राहत की बात यह है कि कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए है। कोर्ट ने राज्य सरकार को 2 सप्ताह के भीतर एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है।
कोर्ट ने सरकार से निम्नलिखित बिंदुओं पर स्पष्ट जानकारी मांगी है। अतिक्रमण की जद में कुल कितनी जमीन है। वहां वर्तमान में कितने लोग निवास कर रहे हैं। वहां हुए निर्माणों की प्रकृति क्या है।पूरे क्षेत्र का विस्तृत साइट प्लान पेश करें। इस मामले की अगली सुनवाई अब दो हफ्ते बाद होगो। जिसमें सरकार द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़ों और साइट प्लान की समीक्षा की जाएगी।

