


उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के सुदूर सुमाड़ी गांव में जन्मे खेमराज सुंदरियाल की जीवन यात्रा साधारण से असाधारण बनने की मिसाल है। भारतीय हथकरघा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले खेमराज सुंदरियाल को इस वर्ष पद्मश्री सम्मान से नवाज़ा गया है। 84 वर्ष की उम्र में यह सम्मान उनके दशकों लंबे समर्पण, मेहनत और शिल्प के प्रति अटूट प्रेम का प्रतीक है। हालांकि, इस उपलब्धि के साथ उनके मन में एक कसक भी है, क्योंकि देवभूमि उत्तराखंड में रहकर अपने अनुभव और ज्ञान से स्थानीय हथकरघा उद्योग को आगे बढ़ाने का उनका सपना अब तक पूरा नहीं हो सका।
2 फरवरी 1943 को एक किसान परिवार में जन्मे खेमराज सुंदरियाल ने शुरुआती शिक्षा के बाद श्रीनगर गढ़वाल स्थित जीएनटीआई से बुनाई में डिप्लोमा किया। बेहतर भविष्य की तलाश में वह युवावस्था में दिल्ली पहुंचे, जहां उन्होंने कपड़ा मिल में काम करते हुए अपने हुनर को तराशा। बाद में बुनकर सेवा केंद्र से जुड़कर उन्होंने हथकरघा, डिजाइन और टेक्सटाइल की बारीकियों को गहराई से समझा। यही वह दौर था, जब उनकी कला ने नया आकार लिया और भारतीय हैंडलूम को आधुनिक सोच से जोड़ने की शुरुआत हुई।
हरियाणा के पानीपत में अपने लंबे करियर के दौरान खेमराज सुंदरियाल ने पारंपरिक बुनाई तकनीकों को न केवल संरक्षित किया, बल्कि उन्हें नए प्रयोगों के साथ वैश्विक बाजार के अनुरूप भी ढाला। खेस, जामदानी और पारंपरिक कपड़ों को उन्होंने वॉल हैंगिंग, बेडशीट, शॉल और सजावटी वस्तुओं के रूप में नई पहचान दिलाई। उनके बनाए उत्पाद देश-विदेश की प्रदर्शनियों और बाजारों तक पहुंचे, जिससे भारतीय हथकरघा की साख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत हुई।
रिटायरमेंट के बाद जब वह अपने गांव और प्रदेश लौटे, तो मन में यही इच्छा थी कि उत्तराखंड के बुनकरों को प्रशिक्षित कर यहां के हथकरघा उद्योग को नई दिशा दें। लेकिन अपेक्षित सहयोग और ठोस व्यवस्था के अभाव में उनका यह सपना अधूरा रह गया और उन्हें फिर से पानीपत लौटना पड़ा। वह कहते हैं कि उम्र भले ही बढ़ गई हो, लेकिन गांव की मिट्टी से उनका रिश्ता आज भी उतना ही गहरा है और यदि अवसर मिले, तो वह अब भी देवभूमि के शिल्प को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए तैयार हैं।
गणतंत्र दिवस 2026 के अवसर पर घोषित पद्म पुरस्कारों की सूची में देशभर से 113 लोगों को पद्मश्री सम्मान दिया गया है, जिनमें उत्तराखंड से तीन नाम शामिल हैं। खेमराज सुंदरियाल के साथ पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी और बागेश्वर के कैलाश चंद्र पंत को भी इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिए चुना गया है। खेमराज सुंदरियाल की कहानी न केवल एक शिल्पकार की सफलता की गाथा है, बल्कि यह भी बताती है कि यदि सही सहयोग मिले, तो उत्तराखंड की पारंपरिक कला और हथकरघा दुनिया भर में नई पहचान बना सकते हैं।







