
बलविंदर कौर जी का समर्पण समाज के लिए एक मिसाल है।शिक्षा केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक साधना है—इस बात को सार्थक कर दिखाया है गुरुद्वारा सिंह सभा स्कूल की शिक्षिका बलविंदर कौर ने। पिछले 18 वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सेवाएँ दे रहीं बलविंदर कौर आज उन बच्चों के लिए उम्मीद की किरण बन गई हैं, जिनके पास प्रतिभा तो है लेकिन संसाधनों की कमी है।
संघर्ष और सेवा का अनोखा संगम

बलविंदर कौर का जीवन चुनौतियों से भरा रहा है। उनके पति चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ हैं, जिसके कारण घर की आर्थिक और शारीरिक जिम्मेदारियों का बोझ उन्हीं के कंधों पर है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि उन्होंने कभी भी अपनी निजी परेशानियों को अपने ‘शिक्षक धर्म’ के आड़े नहीं आने दिया।
घर को बनाया ‘निशुल्क विद्या का मंदिर’

उनकी संवेदनशीलता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि वे पिछले कई वर्षों से अपने घर पर उन बच्चों को नि:शुल्क ट्यूशन पढ़ा रही हैं, जो स्कूल या ट्यूशन की फीस भरने में सक्षम नहीं हैं। उनके लिए शिक्षा का मतलब व्यापार नहीं, बल्कि समाज का उत्थान है।
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18 साल का अटूट शिक्षण अनुभव।
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निस्वार्थ भाव: गरीब बच्चों के लिए मुफ्त कोचिंग की व्यवस्था।
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दृढ़ निश्चय: पति की बीमारी और आर्थिक तंगी के बावजूद कभी अवकाश या हार नहीं मानी।
“बच्चों को शिक्षित करना ही मेरा पहला कर्तव्य है। जब मैं किसी बच्चे को फीस की कमी के कारण पीछे छूटते देखती हूँ, तो मेरा मन नहीं मानता। मुश्किलें तो जीवन का हिस्सा हैं, पर शिक्षा रुकनी नहीं चाहिए।” — बलविंदर कौर
आज बलविंदर कौर न केवल अपने स्कूल, बल्कि पूरे समाज के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन चुकी हैं। उनकी यह तत्परता और त्याग हमें सिखाता है कि अगर इरादे नेक हों, तो कोई भी बाधा आपको आपके लक्ष्य से नहीं डिगा सकती।
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