ऋषिकेश। तीर्थनगरी ऋषिकेश को अध्यात्म और शांति का केंद्र माना जाता है, लेकिन अगर आप यहां के त्रिवेणी घाट या रेलवे रोड पर पैदल चलने की सोच रहे हैं, तो जरा संभल जाइये। वर्तमान में यहां की सड़कें पैदल चलने वालों के लिए नहीं, बल्कि दुकानदारों का सामान और रेहड़ी-फड़ सजाने के लिए बनाई गई प्रतीत होती हैं। शहर में अतिक्रमण की भयावह स्थिति को देखकर साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रशासन की ‘कृपा’ से अतिक्रमणकारियों के हौसले सातवें आसमान पर हैं।
गुरुवार का ‘अनोखा चमत्कार’
शहर में साप्ताहिक बंदी (गुरुवार) के दिन एक अनोखा चमत्कार देखने को मिलता है। गुरुवार को जब बाजार बंद रहता है, तो यही सड़कें अचानक चौड़ी, साफ और बेहद सुंदर दिखने लगती हैं। लेकिन बाकी के छह दिन ये सड़कें इतनी सिकुड़ जाती हैं कि यहां से गुजरने वाले बुजुर्गों, महिलाओं और स्कूली बच्चों को अतिक्रमण के दलदल के बीच से ‘खतरों का खिलाड़ी’ बनकर निकलना पड़ता है। स्थानीय जनता इस अव्यवस्था के खिलाफ चिल्ला-चिल्ला कर थक चुकी है, लेकिन उनकी शिकायतें सरकारी दफ्तरों में धूल फांक रही हैं और प्रशासन मौन व्रत धारण किए बैठा है।
रसूख के आगे नतमस्तक जिम्मेदार, रटा-रटाया जवाब
जब भी इस संबंध में प्रशासनिक अधिकारियों से सवाल पूछे जाते हैं, तो उनका एक ही रटा-रटाया जवाब मिलता है कि—“समय-समय पर कार्रवाई की जाती है।” लेकिन बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि अगर प्रशासन सच में कार्रवाई करता है, तो उसके बाद दोबारा उन जगहों पर निगरानी क्यों नहीं रखी जाती?
शहर में आम चर्चा: राजनीतिक रसूख और ऊंचे संपर्कों के चलते जिम्मेदार अधिकारी अतिक्रमणकारियों पर हाथ डालने से डर रहे हैं। यही वजह है कि कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति की जाती है।
इन इलाकों में हालात सबसे ज्यादा चिंताजनक
शहर के प्रमुख व्यावसायिक और व्यस्ततम क्षेत्रों में स्थिति अब बर्दाश्त से बाहर हो चुकी है:
-
रेलवे रोड
-
घाट रोड
-
क्षेत्र रोड
-
मुखर्जी चौक
फुटपाथ पर दुकानें, सड़क पर गाड़ियां
इन इलाकों में दुकानदारों ने फुटपाथों पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया है। दुकानदार पहले फुटपाथ पर अपने चौपहिया और दुपहिया वाहन खड़े करते हैं, और फिर उसके आगे अपनी दुकान का सामान सजा देते हैं। रही-सही कसर बाजार में आने वाले ग्राहक पूरी कर देते हैं, जो अपनी गाड़ियां सड़कों पर आड़ी-तिरछी खड़ी कर देते हैं। इस वजह से हर वक्त जाम की स्थिति बनी रहती है।
अब देखना यह होगा कि क्या कुंभकर्णी नींद में सोया प्रशासन जनता की इस बुनियादी समस्या को गंभीरता से लेता है, या फिर राहगीर यूं ही अपनी जान जोखिम में डालकर इन सड़कों पर चलने को मजबूर रहेंगे।

