ऋषिकेश
आज सनातन धर्म के सबसे पवित्र और कठिन व्रतों में से एक ‘निर्जला एकादशी’ के पावन अवसर पर तीर्थनगरी ऋषिकेश के गंगा घाटों पर श्रद्धा और आस्था का अभूतपूर्व सैलाब उमड़ पड़ा। सुबह ब्रह्ममुहूर्त से ही समूची देवभूमि ‘हर-हर गंगे’ और ‘जय श्री हरि’ के गगनभेदी उद्घोषों से गुंजायमान रही।
घाटों पर लगी श्रद्धालुओं की भारी भीड़
भीषण गर्मी और बढ़ते तापमान के बावजूद श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नजर नहीं आई। तीर्थनगरी के प्रमुख घाटों—त्रिवेणी घाट, भरत घाट, और शत्रुघ्न घाट पर सुबह से ही स्नान करने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। विशेष रूप से त्रिवेणी घाट पर हजारों की संख्या में स्थानीय लोगों के साथ-साथ बाहरी राज्यों से आए तीर्थयात्रियों ने पतित पावनी गंगा में डुबकी लगाकर पुण्य लाभ कमाया। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन द्वारा सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं ताकि घाटों पर किसी भी अप्रिय स्थिति या असुविधा से बचा जा सके।
मंदिरों में पूजा-अर्चना और विशेष दान
गंगा स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने ऋषिकेश के प्राचीन भरत मंदिर, रघुनाथ मंदिर और ऋषिकुंड समेत विभिन्न शिवालयों और विष्णु मंदिरों में जाकर विशेष पूजा-अर्चना की।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार निर्जला एकादशी पर दान का विशेष महत्व है। इस अवसर पर शहर में जगह-जगह स्वयंसेवी संस्थाओं और स्थानीय निवासियों द्वारा राहगीरों के लिए शीतल जल और शरबत की व्यवस्था की गई है। इसके साथ ही, श्रद्धालुओं ने घाटों और मंदिरों के बाहर गरीबों व जरूरतमंदों को:
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जल से भरे कलश
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हाथ के पंखे
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सत्तू, फल और अनाज
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वस्त्र और दक्षिणा दान कर पुण्य कमाया।
क्यों खास है निर्जला एकादशी?
शास्त्र मान्यताओं के अनुसार, वर्ष भर की 24 एकादशियों में निर्जला एकादशी (जिसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है) को सबसे श्रेष्ठ और फलदायी माना गया है। इस व्रत में सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी के सूर्योदय तक अन्न और जल का पूरी तरह त्याग करना होता है।
ऐसी मान्यता है कि जो श्रद्धालु साल भर की सभी एकादशियों का व्रत रखने में असमर्थ हैं, वे यदि केवल इस एक एकादशी का पूर्ण निष्ठा से व्रत रख लें, तो उन्हें साल भर की सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त हो जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस पवित्र दिन भगवान विष्णु की आराधना करने से दीर्घायु, आरोग्यता और मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है।

